कतर के रेगिस्तान में मिले 12 रहस्यमय प्रतीक, इस्लामी काल के होने के संकेत

कतर के रेगिस्तान में खोजकर्ताओं को कुछ ऐसे रहस्यमय चिन्ह मिले हैं जिन्हें देखने के बाद वो खुद भी आश्चर्यचकित है. कतर के उत्तरपूर्व में अल जस्सासिया के रेगिस्तान में ये आकृतियां खोजी गई है. पुरातत्वविदों के मुताबिक अल जस्सासिया में नक्काशी या पेट्रोग्लिफ्स कुल 900 पत्थर पर पाई गई है. हालाँकि इनमें से ज्यादातर पैटर्न को समझा नहीं जा सकता है, खोजकर्ता लगातार इन्हें समझने की कोशिश कर रहे है.

पुरातत्वविदों इसे लेकर अभी तक यह नहीं समझ सके है कि ये आकृतियां किस पैटर्न पर बनी है, असल में यह कई तरह के पैटर्न पर निर्माण है, इसमें से कुछ में तो पानी के जहाजों के चित्र भी मौजूद हैं.

पत्थरों पर उभरे रहस्यमय प्रतीक

इसे लेकर कतर म्यूजियम के उत्खनन और साइट मैनेजमेंट के चीफ फरहान सकल ने मीडिया को जानकारी दी है. उन्होंने कहा है कि अरब प्रायद्वीप में रॉक कला आम रही है, अल जस्सासिया में पाई कई कुछ नक्काशी अद्वितीय हैं जो हमें दुनिया में और कहीं भी देखने को नहीं मिलती है.

al jassasiya rock carvings qatar

जहां पाई कई नक्काशी उच्च स्तर की है और ये हमें उस वक्त के कलाकारों की क्षमता के बारे में भी बहुत कुछ बताई है, उन्होंने ऐसी जगह पर जहाजों वाले चित्रों बना दिये है जहां से समुद्र को देख पाना भी मुश्किल है. कतर में करीब 12 ऐसी नक्काशियां देखने को मिली है, इसमें से ज्यादातर हमें कतर के तटीय इलाकों में बनी हुई मिली है.

जबकि कुछ नक्काशियों को दोहा के अल बिद्दा पार में भी पाया गया है, 1957 में अल जस्सासिया को पहली बार खोजा गया था. जो दोहा से करीब एक घंटे की दूरी पर है, जहाँ पर निर्मित आकृतियों की खोज 1973 के लास्ट में और 1974 की शुरुआत में एक डेनिश टीम ने की थी जिसका नेतृत्व पुरातत्वविद् होल्गर कपेल और उनके बेटे द्वारा किया गया था.

रेगिस्तान में मिले समुद्री जहाजो के चित्र

इसके साथ ही इलाके में सबसे प्रमुख पैटर्न में बनी हुई सात छेदों की दो समानांतर लाइनें मिली है, कुछ लोगों का कहना है कि इनका इस्तेमाल मनकाला खेलने के लिए होता था. बता दें कि मनकाला दुनिया के कई हिस्सों में प्राचीन काल से खेला जाने वाला लोकप्रिय बोर्ड गेम रहा है. इसमें पत्थरों के टुकड़े को उछालकर दो खिलाड़ी यह गेम खेला करते थे, जो आज के लूडो से मिलता-जुलता था.

वहीं वैज्ञानिकों के बीच आकृतियों के समयकाल को लेकर मतभेद है. कुछ शोधकर्ताओं के मुताबिक यह नवपाषाण से लेकर इस्लामी काल के दौरान के है, जबकि कुछ का कहना है कि इनका कुछ सौ साल से अधिक पुराने होने का कोई साक्ष्य नहीं है. हालाँकि समय से ज्यादा ध्यान सभी वैज्ञानिकों का इन आकृतियों को समझने पर है.

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