कृषि कानूनों को लेकर किसानों की आशंकाओं ने लिया सच का रूप, कंपनियां चला रही मनमानी

संसद ने पिछले साल तीन कृषि बिलों को पास किया. तब से ही इन कृषि कानूनों को लेकर किसानों के मन में कई सवाल और आशंकाएं बनी हुई थी और इसी के चलते इसका जमकर विरोध भी किया गया. अब किसानों के मन में बनी हुई आशंकाएं सच्चाई का रूप लेती नजर आने लगी है. मोदी सरकार के इन किसान बिलों का खूब विरोध किया गया.

बिल का विरोध करते हुए किसान लगातार कहते रहे है कि अगर सरकार कृषि कानून लागू करती है तो किसान बड़े कॉरपोरेट घरानों के भरोसे रह जाएंगे. जिसके चलते किसानों को उनकी फसल का कॉरपोरेट की तरफ से उचित मूल्य नहीं मिलेगा.

सच साबित होता दिख रहा किसानों का डर?

इसे लेकर भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने एक बयान भी जारी किया था. टिकैत की आशंका अब हिमाचल प्रदेश में हकीकत की शक्ल देती नजर आ रही है. दरअसल अडानी एग्री फ्रेश कंपनी सेब की खरीद करने हिमाचल पहुंची है.

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कंपनी ने सेब खरीदने के लिए जो रेट तय किये है उनसे बागवानों को जोर का झटका लगा है. कंपनी द्वारा लगाए गए दामों से बागवानों में काफी नाराजगी देखने को मिल रही हैं. बताया जा रहा है कि पिछले साल के मुकाबले इस साल 16 रुपए प्रतिकिलो के हिसाब से कीमत कम तय की गई है.

अडानी एग्री फ्रेश ने मंगलवार को कीमतों का ऐलान किया और बताया कि अस्सी से 100 फीसदी रंग वाला एक्स्ट्रा लार्ज सेब 52 रुपये प्रति किलो रहेगा जबकि लार्ज, मीडियम और स्मॉल सेब 72 रुपये प्रति किलो की दर पर खरीदा जाएगा.

जबकि बीते साल एक्स्ट्रा लार्ज सेब 68 रुपए प्रतिकिलो बेचा गया था. वहीं लार्ज, मीडियम और स्मॉल सेब 88 रुपये प्रति किलो से दर से बेचा गया था. मंडियों के बाद अडानी एग्री के रेट भी कम होने से बागवानों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है.

बता दें कि बागवानों को अपना सेब अडानी एग्री फ्रेश को देने के लिए क्रेटों में अडानी के कलेक्शन सेंटर तक लेकर जाना होगा. कंपनी ने यह रेट 26 से 29 अगस्त तक के लिए तय किया है. वहीं अडानी एग्री फ्रेश के टर्मिनल मैनेजर पंकज मिश्रा के अनुसार उन्होंने मंडियों के मुकाबले अच्छे रेट तय किए हैं. मंडियों में रेट देखने के बाद ही कंपनी ने दाम तय किये है.

वहीं कृषि मामलों के जानकार देवेंद्र शर्मा ने इस मसले पर कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के आभाव में मंडियां और कंपनियां अपनी मनमर्जी कर रही है. यही वजह है कि किसान कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं. साथ ही किसान एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाए जाने की मांग उठा रहे है.

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